कितना आसान लगता था

भीगी गज़ल कितना आसान लगता था ख़्वाब में नए रंग भरना आसमाँ मुट्ठी में करना ख़ुश्बू से आँगन सजाना बरसात में छत पर नहाना कितना आसान लगता था दौड़ कर तितली पकड़ना हर बात पर ज़िद में झगड़ना झील में नए गुल खिलाना कश्तियों में, पार जाना कितना आसान लगता था जिंदगी में प... [पूरी पोस्ट]
writer श्रद्धा जैन
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[13 Nov 2009 10:13 AM]

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