मुरली तेरा मुरलीधर 31
बार बार पथ घेर घेर वह टेर टेर तुमको मधुकर तेरे रंग महल का कोना कोना कर रसमय निर्झर सारा संयम शील हटाकर सटा वक्ष से वक्षस्थल टेर रहा है हृदयवल्लभा मुरली तेरा मुरलीधर।।166।। हृदय सिंधु के द्युतिमय मोती पलकों में भर भर मधुकर सच्चा सरसिज मृदु...
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हिमांशु । Himanshu
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[13 Nov 2009 13:54 PM]



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