सरमस्तों की महफ़िल में गजानन मुक्तिबोध आया

मुक्तिबोध ज़माने भर का कोई इस क़दर अपना न हो जाए कि अपनी ज़िंदगी ख़ुद आपको बेगाना हो जाए। सहर होगी ये शब बीतेगी और ऐसी सहर होगी कि बेहोशी हमारे होश का पैमाना हो जाए। किरन फूटी है ज़ख़्मों के लहू से : यह नया दिन है : दिलों की रोशनी के फूल हैं – नज़राना हो जाए।... [पूरी पोस्ट]
writer रंगनाथ सिंह
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[13 Nov 2009 13:25 PM]

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