मुक्तिबोध की कविता - मैं उनका ही होता

Kavi Sammelan मैं उनका ही होता, जिन में मैंने रूप-भाव पाये हैं वे मेरे ही हिये बंधे हैं जो मर्यादायें लाये हैं मेरे शब्द,भाव उनके हैं, मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत और अथ मेरा, ऐसे किन्तु चाव उनके हैं मैं ऊँचा होता चलता हूँ उनके ओछेपन से गिर-गिर, उनके छिछलेपन से ख... [पूरी पोस्ट]
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मुक्तिबोध

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[13 Nov 2009 13:21 PM]

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