हमें नेता नही प्रबन्धक चाहिये!
एक कविता जो मैने अपने बचपन में लिखी थी और आज मुझे एक टुकड़ा मिला है उसका जो फ़टा हुआ था बचे हुए अंश................ नेताओं के इस जंगल में नेताओं के इस दंगल में तिल-तिल जलता है इंसान (शोषित होता है इन्सान) नेताओं के इस दलदल में फ़ंसता रहता है इन्सान न...
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Krishna Kumar Mishra
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[13 Nov 2009 06:38 AM]



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