उफ्फ! ये जो है ज़िंदगी
एक झुका हुआ सिर फुटपाथ पर निढाल चेहरे पर निराशा और हाल-बेहाल सिगरेट से ऊर्जा का कश खींचता अपनी निराशा को सींचता सुलगती सिगरेट के अंगारे में उम्मीद तलाश रहा था उड़ते धुंए को ज़िदगी का ‘प्रोपेलर’ समझ रहा था फिर, बुझते अंगारे में मंद पड़ी उम्मीद को जूते...
[पूरी पोस्ट]
मधुकर राजपूत
24
1
0
1
2
[13 Nov 2009 03:23 AM]



Shuffle








