भाषा रहेगी तो हम भी रहेंगे

प्रतिवाद यह कहीं किसी दूसरे देश में हुआ होता तो बात समझी जा सकती थी परंतु यह सब अपने 'लोकतांत्रिक देश' में हुआ तो शर्म नहीं घृणा होती है। घृणा होती है क्षुद्र राजनीति से। घृणा होती है भाषाई हिटलरशाही से। घृणा होती है अलोकतांत्रिक वर्चस्व से। घृणा होती है क्षे... [पूरी पोस्ट]
writer अंशुमाली रस्तोगी
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[13 Nov 2009 00:26 AM]

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