कहाँ नयन मेरे रोते हैं
कहाँ नयन मेरे रोते हैं पलक रोम में लख कुछ बूदें या टूटे पा मेरे घरौंदे सोच रहे हों बस इतने से ,नहीं रात भर हम सोते हैं जो जोडा था वह तोड़ा हैं मिथ्या सपनों को छोडा हैं पा करके अति ख़ुशी नयन ये,कभी-कभी नम भी होते हैं बीते पल के पीछे जाना हैं मृग-जल से...
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vikram7
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[12 Nov 2009 22:26 PM]



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