तीन फ़िल्में..
डॉक्यूमेंट्री थी, फ़िल्म देखे कुछ दिन हो गए लेकिन अवचेतन में अभी भी जैसे कहीं अटकी हुई है. कुछ ख़ास फ़िल्मों के साथ क्या होता है ऐसा कि एक अच्छी बितायी शाम की तरह स्मृति और संवेदना में कहीं कुछ छूटा रह जाता है? पियेर बोर्दू , पहले कभी नाम सुन...
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Pramod Singh
डॉक्यूमेंट्री
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[12 Nov 2009 17:35 PM]



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