गजल-- आख़िरी सलाम
खूने जिगर से लिख रहा हूं आखिरी सलाम इल्तजा बस जरा सी कबूल इसको कर लेना। इन्तजार करते करते हो गई इंतहा इंतजार की दिले खयाल तब आया नहीं नसीब में तेरा दीदार होना। जीते जी ना सही जब हो जाऊं सुपुर्दे खाक मैं मजार पर आके मेरी अश्क दो बहा लेना। तेरे दो अश्क...
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JHAROKHA
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[12 Nov 2009 12:57 PM]



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