मै बस देखूगा !
बस, हतप्रभ अकिंचन मैं देखूंगा , चुप ! विस्मित ! तुम हंसो ! ! ! अपनी वो पूरी खुली भरी और गाढ़ी हंसी ! मेघाछ्न्न गदराये आकाश से और न सम्हल सकी , उन्मुक्त, उत्फुल्ल, दिनों बाद यकायक भहरायी जोरदार बरसात-सी हंसी ! ! ! तुम हंसो ! ! मैं बस देखूंगा वह मोतियों...
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Aarjav
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[12 Nov 2009 11:23 AM]



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