हर हिस्से की धूप तय है
मौसम भी क्या शय है हर हिस्से की धूप तय है करता है गुलशन जो बेमानी पकड़ी जाती है नादानी जीवन की ये कैसी लय है छाया की प्यासी मय है अजीब हादसा है बेनामी मुँह छिपाए है गुमनामी सरक जाने का भय है धूप-छाया की कच्ची वय है...
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शारदा अरोरा
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[12 Nov 2009 01:27 AM]



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