एक पल
यह नि:शब्द रात यह स्वच्छ चांदनी पेडों पर यह झींगुर का बोलना यह मेढक की टर्र टर्र शहर के कोलाहल से दूर इस गांव में क्या यह स्वर्ग उतरा है धरती पर यह तारों भरा आसमान यह मधुर मंद बयार हौले हौले से उडते ये तुम्हारे केश अपार यह चांदनी कितनी रहस्यमय लगती ह...
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मथुरा कलौनी
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[11 Nov 2009 23:30 PM]



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