नहीं रहे कागद मसि के मसीहा !

जाते-जाते... अपनी कलम का जादू बिखेरने की तैयारी में लगे प्रभाष जोशी की आंखे जैसे सचिन के बल्ले से निकले एक-एक शॉट को जेहन में उतार लेना चाहती थी। हैदराबाद में सचिन जब अपने पुराने अंदाज़ में खेलते नज़र आ रहे थे तो पत्रकारिता के उस शीर्ष के हर पाठक को शायद सुबह का... [पूरी पोस्ट]
writer vikas vashisth
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[11 Nov 2009 05:58 AM]

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