चौराहा पे राही

अंतर्द्वंद का आइना हर वक़्त ख़ुद को चौराहे पर खड़ा पाता हूँ, टार्च पास नहीं, अंधेरे में भटक जाता हूँ। जो सीधे रास्ते चले थे आगे निकल गए, हम नए राह की खोज में पिछरते चले गए। वक्त का तकाजा समझा मैं ठोकरों के बाद लहूलुहान थी शख्सियत, खुले थे मेरे हाथ। गर चाहते हो तुम, दामन... [पूरी पोस्ट]
writer knkayastha

Hindi-Poems

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[11 Nov 2009 02:53 AM]

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