पर उपदेश कुशल बहुतेरे...
रह पाओ जिंदा मरने के बाद भी... " शीर्षक कविता पर आदरणीय शरद कोकास जी की टिप्पणी समझ में नही आई थी और उन्होने विस्तार में मेल से बताने की बात कही थी पर शायद भूल गये... मैने दुबारा समझने की कोशिश की और जो समझ में आया उससे मधुशाला की पंक्तियाँ याद आ गयी...
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अम्बरीश अम्बुज
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[10 Nov 2009 05:50 AM]



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