अपने-अपने दोजख
ख्वाबों के जंगल में भटकते हुए पीली धूप के किसी पेड़ तले उकताए, हारे, हांफते एक दूसरे को निहारते... कुछ महीने पहले सैय्यद जैगम इमाम की कविता पर लिखते वक्त अहसास नहीं था कि पीली धूप के पेड़ों तले एक दोजख भी है...लेकिन नहीं वो भूल थी जिसका अहसास मुझे अब...
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मिहिर
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[09 Nov 2009 14:09 PM]



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