तुम्हारा मौन
तुम्हे ही ढ़ूढती रहती हैं मेरी नज़रें, जिस किसी गली या डगर से भी गुजरें, क्यों यह मन हो रहा है यूं अनुरागित, मैं स्वयं ही सोच रहा हूं होकर चकित, लगता है तुम यहीं पर हो मेरे आस पास कहीं, जानबूझ कर गढ़ा यह अहसास भ्रम ही सही, तुमसे हरदम बात बेबात बतियाने क...
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विजय प्रकाश सिंह
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[09 Nov 2009 00:31 AM]



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