जितने भी थे गवाह वो सारे मुकर गये....
मित्रों, आज ये मेरी पचासवीं पोस्ट हाजिर है। कच्छप -गति से चलते-चलते आपके दुआओं के सहारे यहां तक आ पहुंचा हूं। इसी कड़ी में आज पढ़िये ये गज़ल जो आदरणीय प्राण शर्मा जी के सुझावों और आशीर्वाद के बाद कहने लायक बन पाई है- कुछ बिक गये, कुछ एक जमाने से डर गये...
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रविकांत पाण्डेय
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[08 Nov 2009 21:56 PM]



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