मैं उजाला हूँ
रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' मैं उजाला हूँ , उजाला ही रहूँगा । अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा । चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए , पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा ॥ पल जो भी मिले हैं मुझे उपहार में । उनको लुटा दूँगा मैं सिर्फ़ प्यार में । नफ़रत की फ...
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सहज साहित्य
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[07 Nov 2009 08:51 AM]



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