हमें बुलाती है दुनिया हमीं नहीं जाते
आज मुन्नवर राना को पढ़ने का बहुत मन किया तो नेट को खंगाला। कविता कोष पर वह मिले। उन्हें पढ़ते वक्त पाठक एक अंश में खुद को भी पढ़ता है, ऐसा मेरा मानना है। बतौर पाठक, आप भी पढिए. शुक्रिया गिरीन्द्र --------------- 1 कहीं भी छोड़ के अपनी ज़मीं नहीं जाते...
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गिरीन्द्र नाथ झा
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[07 Nov 2009 05:27 AM]



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