प्रभाष जी, क्या सचमुच आप इस रविवार "कागद कारे" लेकर नही आऐंगे?
रविवार की सुबह "कागद कारे" का ऐसे इंतजार होता था। रविवार की सुबह देर तक मैं चाहकर भी सो नही पाता। क्योंकि रविवार है। और किसी चीज का इंतजार है। आँख खुलते ही मुँह से आवाज निकलती है पेपर। नीचे से कोई पेपर लेकर आता। पाँच पेपरों में से जिस पेप...
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सुशील कुमार छौक्कर
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[06 Nov 2009 23:25 PM]



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