कितना कुछ होना बचा रह जाता है

बेदखल की डायरी इससे पहले कि मुझे घर और दफ्तर की मारामारी के बीच कुछ कलमघसीटी की फुरसत मिले, ये कविता गौर फरमाएं। जीवन में कितना कुछ होना बचा रह जाता है अभी तो कहना था कितना कुछ कितना तो सुनना था एक नदी थी जिसके उस पार जाना था पहाड़ी पर फिसलना था एक बार सुदूर जंगल क... [पूरी पोस्ट]
writer मनीषा पांडे
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[06 Nov 2009 22:07 PM]

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