पीड़ा कब पढ़ आई हिज्जे
अपनी पीड़ा को बाँधोगे ,सँगीत ,बहर और काफिये में सैलाब कहाँ बहता है , किनारे समेट के सिम्तों में बाँधो बाँधो टुकडों में , हवा और आँधियों को कर लो तुम क़ैद गुबार, धुँए और लपटों को सरहद बाँधे इन्सानों को , मजहब बाँधे भगवानों को इश्क की कोई जात नहीं होती...
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शारदा अरोरा
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[06 Nov 2009 10:33 AM]



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