अवसाद के दिनों में सच !
सच इतना अधिक है चहुं ओर हमारे खड़ा बैठा चलता दौड़ता कि हम सह नहीं पाते हैं फट फट जाते है माया मिथ्या आभास कह कह उसे टरकाते हैं ! किनारे बेवकूफॊं जैसा चुपचाप खड़ा अपने पातॊं पर बिलखले आसमान के घनीभूत दुखॊं को समोता न हसता न चिचियाता अनभिप्रेत खड़ा पेड़ ! !...
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Aarjav
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[06 Nov 2009 09:25 AM]



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