अब इयादि आवता लरिकाई
बाबूजी के डाँटल अब बरदास्त से बाहर हो गइल रहे। हम माई से कहि देहनी की बाबूजी के समझा दे, बाति-बाति पर घघोटें मति। अब हम लइका नइखीं। कहीं एइसन मति होखे कि हमरियो मुँहे में से उलटा-सुलटा न निकलि जाव। ए पर माई हमके समझावे अउर कहे की बाबू, तोहरे बाप न हउ...
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प्रभाकर पाण्डेय
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[06 Nov 2009 07:18 AM]



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