पावस प्रात बिखरी पड़ी है ......
पावस प्रातः बिखरी पड़ी है..... ले सीली सी ताप औ हलकी सी भाप पावस प्रातः बिखरी पड़ी है ..... बादल से न बोलूं आज फिर छितराऊ रश्मि का राज नग -शिखर पर टिका कर कोहनी भोर-नवोढा विचर रही है झील -झील की बूँद-बूँद में पावस प्रातः निखरी पड़ी है ..... नील गगन का क...
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swati
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[06 Nov 2009 06:45 AM]



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