पापा ! नक्सली सचमुच बदमाश हैं
राज्योत्सव में टंगे कुछ चित्रों के बहाने कई बार शब्दों का अपना जादू नहीं चल पाता । वे अपने भीतर समाये हुए अर्थों को भावक या मनुष्य के मस्तिष्क तक पहुँचा नहीं पाते । पूरी पंक्तियाँ साधारणीकरण की शिकार हो जाया करती हैं । विचार के गर्भ तक पहुँचते-पहुँचत...
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जयप्रकाश मानस
प्रजातंत्र
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[05 Nov 2009 22:25 PM]



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