बरसाती मेढक फिर टर्राने लगे
ये शीर्षक मेरी ग़ज़ल के लिए नहीं मेरे लिए है...क्यूंकि ब्लॉगजगत में मेरा आना जाना बरसाती मेढकों कि तरह ही है ...क्या करें इस खानाबदोश ज़िन्दगी में कभी कभार ही अपने लिए समय चुरा पाते हैं ॥ फिर भी लगता है ये बरसात अगले कुछ महीने चलती रहेगी ... उसके आगे...
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शोभित जैन
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[05 Nov 2009 07:51 AM]



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