पेट की खातिर या ठंड की खातिर
किसी काम से दिल्ली जा रहा था। रास्ते में आधी रात को एक स्टेशन पर गाडी रूकी। आंख खुल गई। तो बाहर जो नजारा देखा उसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। सुबह सुबह की मीठी मीठी कुनकुनी सी ठंड तन पर नाम मात्र कपडे कंपकपाता जिस्म सिकुड रहा है अपने आप में...
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मोहन वशिष्ठ 9988097449
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[05 Nov 2009 06:38 AM]



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