मत ढूँढ बाहर
उस एक स्वरुप में क्यूँ न खोजा तूने जो दूसरे में पाना चाहता है मानव तू क्यूँ भटकना चाहता है भावों के दलदल में क्यूँ धँसता जाता है तेरे हर ख्वाब की ताबीर वहीँ है हर चाहत का हासिल वही है हर राह की मंजिल वही है फिर क्यूँ तू मरुभूमि में जल के कण ढूंढ़ना च...
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वन्दना
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[05 Nov 2009 03:49 AM]



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