अधरों पर खिलते फूल
डॉ . अशोक प्रियरंजन शब्द बन जाते हैं फूल महकने लगती है उनकी अर्थवत्ता संपूर्ण ब्रह्मांड में जब वो खिलते हैं तुम्हारे अधरों पर ठहर जाता है कोलाहल रुक जाती है हवा की सरसराहट सन्नाटा बुनता है वातावरण में नई भाषा ऐसे में बोलती हैं सिर्फ आंखें मुखर होता ह...
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dr. ashok priyaranjan
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[04 Nov 2009 15:03 PM]



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