हजार रुपये का चालान, 45 रुपये की ब्रांडी और बर्फ़ का नामोनिशान नहीं…. लब्बोलुआब- मनाली मत जइयो गोरी राजा के राज में।

मैनें आहुति बनकर देखा.. बहुत देर से सोच रहा था कि क्या शीर्षक रखूँ। फाइनली ये ग़दर शीर्षक दिमाग में भक्क से चमक उठा और हमने उसे यहाँ ला धरा। सबको दुआ-सलाम। इतने दिन से गायब रहने के कारण दो थे- एक गोबरपट्टी में बसे अपने गाँव की यात्रा, दूसरी लौटते ही बर्फ़पट्टी© में बसे मनाल... [पूरी पोस्ट]
writer कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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[04 Nov 2009 07:07 AM]

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