स्वयं
मैंने खुद को अभी पाया कहाँ बात जो कहनी थी दिल की वो अभी तक लवों पर लाया कहाँ है जो ये चिर-परिचित शख्स खुद के अन्दर खुद को खुद से मिलाया कहाँ है नहीं ये आरजू कि आसमान में फैला के पंख मैं उडू कैद से मुक्त हो जाऊँ मैं हूँ बस इतना चाहता सारी दौलत, सारी च...
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अनिल कान्त :
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[04 Nov 2009 06:43 AM]



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