बन्द दरवाजों का नहीं अफसोस

मेरी रचनाऍ बन्द दरवाजों का नहीं अफसोस मुझे   खोल दो खिड़कियाँ की दम धुटता है   आह तुमने न सुनी तो न सही   चीखँ पर तो अजनबी भी पलटता है   राह उनको दिखाता है फिसलन कि   और हँसता है जब कोई फिसलता है   वो कह रहा था मुझसे कि बन दरियादिल... [पूरी पोस्ट]
writer विपिन बिहारी गोयल
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[04 Nov 2009 02:55 AM]

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