ब्रांड आतंकवाद

मन उवाच..... एक ब्रांड आंतकी से टकराव हो गया। हमारी मुलाकात तो पुरानी है लेकिन मुझे ब्रांड की चोट नई-नई लगी है। मेरी तंगहाली के चंद आखिरी रुपयों की क्लासिक रेग्युलर सिगरेट होठों में भींचे, ब्रांड आतंकी मुझे ब्रांड का मर्म समझा रहा है। हम तो यही पीते हैं। इसका स्व... [पूरी पोस्ट]
writer मधुकर राजपूत
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[03 Nov 2009 23:02 PM]

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