कहीं यह मेरे पैरों से.....
राह पर चलता हुआ आदमी निहार रहा है राह के कंकड़ों को जिसने कितनों से खाया होगा ठोकर उसकी ओट में जा दुबकती चींटी को यह समझ कर कि कहीं यह मेरे पैरों से दबने के डर से ही नहीं जा चिपकी है उसकी ओट से नन्हीं सी जान जिसे बोध है जीवन मरण का आज आदमी महत्व...
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हेमन्त कुमार
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[03 Nov 2009 21:51 PM]



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