काश! हम भी एक मौसमी दरख्त हो पाते
मौसम की करवट पर, हवाओं की छम-छम पाजेब पर, आशिक़ मिजाज पेडों को जब रंग बदलते देखता हूँ तो सोचता हूँ क्या यही प्यार है, इश्क का इज़हार है एक मौसम का साथ, चंद दोपहरियों का ताप जिनमे साथ कुछ धुप सही, कुछ छाया हवायों से फिर न जाने क्या रिश्...
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Sudhir (सुधीर)
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[03 Nov 2009 14:08 PM]



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