इस जहाँ में मेरे सिवा पागल कई और भी हैं...
इस जहाँ में मेरे सिवा पागल कई और भी हैं खामोशियाँ हैं कहीं तो कहीं कहीं शोर भी हैं मनचला या आवारा बन जाऊँ ये सोचता हूँ लेकिन मेरे इस दिल में किसी और का ज़ोर भी है तन्हाइयों से टूटना शायद मैंने सीखा ही नहीं इसीलिए शायद मेरा ये दिल कठोर भी है हर रोज़ उस...
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रामकृष्ण गौतम
ग़ज़ल
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[03 Nov 2009 11:04 AM]



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