पुरुष विमर्श
एकालाप पुरुष विमर्श ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद नन्हें हाथों में कलम धरी.
भाई! तेरा भी धन्यवाद आगे आगे हर बाट करी.
तुम साथ रहे हर संगर में मेरे प्रिय! तेरा धन्यवाद;
बेटे! तेरा अति धन्यवाद हर शाम दिवस की थकन हरी. शिव बिना शक्ति कब पूरी है शिव का भी शक्ति...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[03 Nov 2009 05:41 AM]



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