व्यंग्यजल --अब तो बाहर है अपने बूते से

virendra jain ke nashtar अब तो बाहर है अपने बूते से बात होने लगी है जूते से घूमते फिर रहे हैं आवारा साँड़ जो बँध रहे थे खूँटे से एकता की दुहाई के दाता खुद नजर आ रहे हैं टूटे से ये मदारी भी खूब हैं यारो पूछते कुछ नहीं जमूरे से कितने बारह बरस हुये प्यारे घूरे अब भी लगे हैं घूरे... [पूरी पोस्ट]
writer वीरेन्द्र जैन
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[02 Nov 2009 13:39 PM]

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