चाटे-काटे स्वान के, दुहूं भान्ती विपरीत .........

कुछ ईधर की, कुछ उधर की ब्लाग दोहावली:- रहिमन लाख भली करौ, इनका जिद्द न जाए राग सुनत, पय पियतहू, सांप सहजहि घर खाए ।। हर पोस्ट में गारी मिलत हैं, भाई लोग चिल्लाहिं रहिमन करूए लिखन कौ, चहियत यही सजाहिं ।। आप न काहू काम के, डार,पात,फल मूर औरन को रोकत फिरैं, आपहूं वृ्क्ष बबूर... [पूरी पोस्ट]
writer पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
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[02 Nov 2009 09:38 AM]

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