बदली हुई फ़िज़ा

कुछ मेरी कलम से -kuch  meri kalam se ** बदली हुई रुत .. बदली हुई फिजा .. जाग रही है ... दो रूहों की एक ही हलचल मद्धम मद्धम .. रात की गहरी चुनरी ओढे चाँद भी मुस्कराया .. और ............. लबों पर तैरता चाँदनी के मुख पर वो हल्का सा तब्बसुम या फ़िर रुकी हुई है कोई शबनम की बूंद .. परियों के अफ़स... [पूरी पोस्ट]
writer रंजना [रंजू भाटिया]
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[02 Nov 2009 06:50 AM]

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