कितना जानता है एक शहर हमें और हम शहर को
इस बार कुछ चार बरस बाद मेरा इलाहाबाद जाना हुआ। इलाहाबाद – वह शहर जहां मैं पैदा हुई, जहां मैंने जिंदगी के बीस बरस गुजारे। वह शहर, जहां से मेरे सुख-दुख की, हंसी और विषाद की, निजी और सामाजिक करुणा और अपमान की और पहले प्यार की सादगी और बेचारगियों की ढेर...
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मनीषा पांडे
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[02 Nov 2009 00:54 AM]



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