...और बदल गईं चिट्ठियां
रात नींद नहीं आई तो कुछ लिखने बैठ गया। एक अजीब सा अहसास आजकल घेरकर रखता है। सोचा उसे कागज पर आकार दे दूं। एक चिट्ठी लिखने उठ बैठा। फिर ये सब चिट्ठियां याद आ गईं। दिमाग विचार मथता रहा और नतीजा ये निकला। चिट्ठियां भी अब कारोबारी हो गईं कॉरपोरेट तल्खियो...
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मधुकर राजपूत
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[01 Nov 2009 23:04 PM]



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