एक तुम्हारा वॄन्दावन
अभिलाषा का दीप जला कर खड़ा हुआ हूँ द्वारे पर अपनी करुणा के पारस से छू मुझको कर दो कंचन जीवन की आपाधापी में भूल गया अपने को भी लेकिन यह मेरी गति तुमसे आखिर कब है अनजानी कर्म प्रकाशित मेरे जितने हैं बस ज्योति तुम्ही से पा व्यथा हदय की तुमसे, तुमसे ही आं...
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Geetkaar
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[01 Nov 2009 21:04 PM]



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