मेरे दुश्शासन
मेरे दुश्शासन वो ख़त जो मैंने तुम्हें लिखे थे हाँ, वो अनकहे ख़त मैंने आज भी सहेज कर रखे हैं मेरी अलमारी में बिछे अखबार की तहों के भीतर आज अचानक वो फिर हाथ लग गये खो गयी थी मैं उन पुरानी बातों में मैंने देखा मेरी सुधियों का चीर थामे तुम आज भी निर्भीक...
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रचना दीक्षित
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[22 Oct 2009 13:51 PM]



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