रिश्ते का मजमून
मुझे नहीं पता इस रचना ने कैसे जन्म लेली मेरे अंदर ,... और फ़िर मैंने इसे कागज पर उकेर दिया ,... आप सब के सामने हाजिर है दुआ करें और प्यार दें ... सर्दी की रात चाँदनी छत पर पसरी हुई हम दोनों बालकनी से उसे छूटे हुए शब्द शुन्य थे समय की संकीर्णता हलकी सी...
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"अर्श"
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[01 Nov 2009 03:41 AM]



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