सपने
टूटते हैं सपने बिखरते हैं सपने प्रतिकूलताओं के प्रस्थर खण्डों में दब कलपते हैं सपने तड़पते हैं सपने मरकर भी कहां मर पाते हैं सपने कभी भूत तो कभी जिन बन जाते हैं सपने तब अक्सर ही सच्चाई की लाशों डराते हैं ये भूत सपने धधक चुकी आग में अन्तिम चिनगारी- से...
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Aarjav
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[31 Oct 2009 11:12 AM]



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