नींद चली आती है.....
बाँट में, अपने हिस्से का सब छोड़, कोने में पड़ी सूत से बुनी वह मंजी अपने साथ ले आई, जो पुरानी, फालतू समझ फैंकने के इरादे से वहाँ रखी थी. बेरंग चारपाई को उठाते बेवकूफ लगी थी मैं, आँगन में पड़ी बचपन और जवानी का पालना थी वह. नेत्रहीन मौसी ने क...
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Shabdsudha
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[30 Oct 2009 22:09 PM]



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